क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण और शिक्षाः झारखण्ड के सन्दर्भ में
Author: * मुन्ना राम महतो ** राधिका कुमारी ***डॉ. चिरंजित सेतुया
DOI: https://doi.org/10.70798/TGJCT/01020006
भारत बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक राज्यों का संघ देश है। ऐसे बहुभाषिक देश में, जहाँ हर राज्य, हर क्षेत्र की अपनी एक विशिष्ट भाषा, बोली और सांस्कृतिक पहचान है, वहाँ शिक्षा का माध्यम यदि बालक की अपनी भाषा हो, तो वह शिक्षा को सहज, सुगम और प्रभावी बनाता है। झारखण्ड भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक राज्य है। यह भारत का 28 वाँ राज्य के रूप में उदृत हुआ है। यह राज्य अपनें जंगलों, झरनों, पहाड़ियों, और पवित्र स्थलों के लिए जाना जाता है। यहाँ भूगोलिक विविधता के साथ ही साथ भाषाई, सांस्कृतिक, जातीय एवं जनजातीय विविधताएँ पायी जाती है। झारखण्ड राज्य में अनेक क्षेत्रीय भाषाएँ और बोलियाँ जैसे- नागपुरी, कुरमाली, कुडुख, संथाली, मुंडारी, खड़िया, हो, खड़िया, पंचपरगनिया आदि प्रचलित हैं, जो बहुसंख्यक विद्यार्थियों की मातृभाषा हैं। परंतु विद्यालयी शिक्षा प्रायः हिंदी अथवा अंग्रेज़ी के माध्यम से दी जाती है, जिससे भाषा की बाधा बच्चों की शिक्षा में बाधक बनती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इस तथ्य को स्वीकार करते हुए प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा या स्थानीय भाषा में दिए जाने की सिफारिश की गई है। यह शोधपत्र इसी पृष्ठभूमि में क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण और शिक्षा (झारखण्ड के सन्दर्भ में) प्रस्तुत करता है। कुंजी शब्द : क्षेत्रीय भाषा, क्षेत्रीय भाषा की संरक्षण, क्षेत्रीय भाषा आधारित शिक्ष

